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आत्मानंद स्कूल के कारण 846 छात्रों का भविष्य अधर में – मयूरेश


सारंगढ अंचल का बहु प्रतिष्ठित विद्यालय जहां कभी मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्व. राजा नरेश चंद्र, भारत सरकार में आईएएस रहे स्व. सुरेंद्र बेहार, दिवंगत आईएएस शरद चंद्र बेहार, दिवंगत आईपीएस विजय शंकर चौबे जैसे दर्जनों महान विभूतियों ने शिक्षा ग्रहण की, आज वह विद्यालय प्रसाशनिक षड़यंत्रों के कारण अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है। जिस विद्यालय के माटी पुत्रों ने पूरे देश मे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया उन माटी पुत्रों का विद्यालय कांग्रेस सरकार के गिद्ध दृष्टि का शिकार होने की कगार में है लेकिन सक्षम नेताओं के कानों में आज भी जूं नही रेंग रही है, उक्त बातें नव निर्वाचित पार्षद व भाजपा सोशल मीडिया प्रमुख मयूरेश केसरवानी ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम ने जनता के समक्ष रखी। मामला कुछ यूं है कि सारंगढ स्थित शा.ब.उ.मा.विद्यालय परिसर में विगत वर्षों से स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालय का भी संचालन हो रहा है। दो पालियों में हिंदी व अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई चल रही थी लेकिन अचानक प्रदेश स्तर से शा.ब.उ.मा.विद्यालय में शिक्षण सेवा दे रहे पूरे 22 शिक्षकों का स्थानांतरण आदेश निकाल दिया गया। पूरे 22 शिक्षको के स्थानांतरण से हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों में हड़कंप मच गया क्योंकि हिंदी माध्यम के कुल 846 विद्यार्थियों को अब अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा है। जानने योग्य बात यह भी है कि 846 में लगभग 250 विद्यार्थी कला संकाय व कृषि संकाय में अध्ययनरत है जबकि आत्मानंद स्कूल के सेटअप में इन दोनों संकायों के लिए कोई विकल्प ही नही है ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ये विद्यार्थी कहाँ जाएंगे।

सन्न 1956 से संचालित व गौरवशाली इतिहास को समेटे इस विद्यालय को बंद करने में कांग्रेस सरकार की हड़बड़ी व स्थानीय नेताओं की मौन सहमति किसी से छिपी नही है। विडंबना का विषय यह भी है कि अनुसूचित जाति बाहुल्य क्षेत्र के सबसे बड़े इस विद्यालय के अधिकांश विद्यार्थी इसी वर्ग से आते हैं जो कमजोर तबके से सम्बंधित रहते हैं जिनके लिए हिंदी माध्यम विद्यालय ही अनुकूल होता है। प्रदेश सरकार के लापरवाही पूर्वक इस फैसले से हिंदी माध्यम के इस विद्यालय का अंत तय है लेकिन आवाज उठाने के सक्षम लोग मौन हैं। कौन सोचेगा की सक्षमों के मौन धारण नुकसान पूरा सारंगढ अंचल को भुगतना पड़ेगा। अनुसूचित बाहुल्य – पिछड़ा वर्ग बाहुल्य क्षेत्र का यह विद्यालय अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है जबकि विधायक, जनपद अध्यक्ष और नगर पालिका अध्यक्ष, अनुसूचित जाति आयोग के शीर्षस्थ पदाधिकारी अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग से ही आते हैं ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर 846 विद्यार्थियों के लिए कौन आवाज बनेगा। जिन लोगों को सत्ता का सिंहासन मिल गया उनके लिए धन की देवी ही सर्वे सर्वा हो गयी और आज सभी नेता माता सरस्वती के केंद्र को विद्या के केंद्र को उपहास की नजरों से देख रहे हैं।

पूरे अंचल का कोई भी बड़ा नेता इस गंभीर मुद्दे पर पहल ना कर के अपने असली मंसूबों को जनता के समक्ष रख दिया है। अत्यंत दुख का दौर है क्योंकि हिंदी माध्यम का कोई भविष्य नही है कभी भी बंद हो सकता है और अंग्रेजी माध्यम में एक कक्षा में 40 से ज्यादा विद्यार्थी का कोई नियम नही है।

सारंगढ अंचल में जानबूझकर विलुप्त किये जा रहे इस विद्यालय के छात्रों के अंधकारमय भविष्य में स्थानीय नेता शायद ऊर्जा के पुंज देख रहे हैं जिसकी वजह से मौन धारण कर के बैठे हैं। आने वाले दिनों में नेताओं की बेरुखी से आम जनता जरूर अपना रौद्र रूप दिखाएगी और ऐसे नेताओं की उनकी असल जगह।

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